भावनाएं सच्ची बात बताती है
अपने दर्द, अपने एहसास और अपने ख्वाब को पन्नो पे लिखता हूँ, ज़माना कहने लगा ….. लो !! गोविन्द कवि हो गया !!
सोमवार, 18 अक्तूबर 2010
अंतर्भावना
--- गोविन्द शर्मा
परिचय
Orkut में मैंने अपना परिचय कुछ इस तरह लिखा है, यहाँ स्थान की कमी होने ने के कारन एक thread बना दिया
मेरे लिए भावः ही सर्वोच्च सिद्धांत है॥ येही सत्य है जो हर प्राणी के ह्रदय से सीधे निकलता है॥ मैं अपनी भावनाओ को कभी नहीं समेटता .. उन्मुक्त रहने देता हूँ.. आख़िर भावुक लोग ही किसी की संवेदना समझते है… हमेशा उन्मुक्त रहना चाहता हूँ.. मेरा विश्वास है की अगर आप कुछ अपने लिए नहीं करने के बजाय किसी और के लिए करे तो उस से किसी व्यक्ति की ही नहीं अपितु दुनिया को भी हानि से बचाया जा सकता है.. मैं किसी को भी स्वीकार करता हूँ.. चाहे वो मुझे स्वीकारे या नहीं.. मुझे आस्था पे विश्वास है.. मैं अपने जीवन में इश्वर की दया हमेशा मानता हूँ.. इसलिए तो आज भी मन्दिर को देखते ही सर स्वतः ही झुक जाते हैं… मुझे हिन्दी और उर्दू से काफी लगाव है… हिन्दी से युग झलकता है.. मित्रो से हमेशा मिल जुल के रहा,॥ कवितायेँ पढने का शौक है कुछ कवितायेँ लिखता भी हूँ ... अगर मेरी लेखनी किसी एक को भी पसंद आ जाये.. तो मैं इसे एक महान उपलब्धि मानूंगा.. मेरा विश्वास है कि पूरी नेकनीयती से काम करने पर भी यदि किसी से गलती हो जाए तो उसे लोग माफ़ कर दिया करते हैं। मेरे अनुसार जीवन एक संघर्ष है.. एक आकांशा है .. हमारी कोशिश इसे पूर्ण करने की होनी चाहिए । अपनी दुर्बलताओं अथवा अपूर्णताओं के कारण ध्येय को नीचा नहीं करना चाहिए। हमें हमेशा कोशिश करनी चाहिए की हम अपनी दुर्बलताओं को ख़त्म करे.. मुझे इस बात का दुखद एहसास है की मेरी अन्दर दुर्बलताएं भी हैं और अपूर्णताएं भी। मैं इन्हें दूर करने में हमेशा प्रयासरत रहता हूँ और मुझे आशा है मैं ऐसा एक दिन कर पाउँगा.. आखिर येही वो कर्म है जिन्हें हमें करना है. *********************************************************कुछ और अपने बारे में बताऊँ तो : अति भावुक और संवेदनशील , अपने नाम से बिल्कुल अलग। श्री गोविन्द के तरह मैंने कभी प्रेम नहीं पाया, पर उन्ही की तरह प्रेम संजोये रखा है। पेशे से एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में परचेस विभाग में कार्यरत हूँ. ये मेरी चौथी नौकरी है. हमेशा उन्मुक्त रहना चाह॥ यादों की वजह से जब कभी नींद खुल जाती है तो, टूटे हुए सपनो से रात गुजर लेता हूँ। कभी चलते चलते मन करता है… किसी पेड़ के निचे बैठ के आकाश को निहारता रहूँ॥या कभी इन हवाओं में अपनी ही खुशबु ढूँढ लेता हूँ। घुमने का शौक काफी ज्यादा है… किसी अनजान सेहर की राहों में अकेला चलना पसंद है.. तो कभी रातों को बिना वजह जागना. हिन्दी साहित्य में काफी रूचि है.. इसलिए अपना परिचय हिन्दी में ही लिखा. कवितायेँ पढ़ना और लिखना काफी लुभाता है. मैं जब भी दुखी होता हूँ, मेरे हाथो में कलम होती है.. और जब भी खुश हुआ तो हाथो में कलम ही होती है… अपना विषाद और अपना प्यार.. लिख के जताने की आदत है. एक अपनी कविता संग्रह बना चुक्का था.. पर किसी ने पसंद ही नहीं किया.. शायद मेरी खुशी में कोई शरिख नहीं होना चाहता. अपनी अति व्यक्तिगत जिंदगी के बारे में बताऊँ तो॥ कुछ ही महीनो में परिणय बंधन में बंध जाऊँगा… पर शायद उस समय भी मेरा परिचय ये ही रहेगा ----- अति भावुक और संवेदनशील।---------------------------------------------सच कहू तो मेरे पास मेरा कुछ भी नहीं, मेरा शारीर भी तो मेरा नहीं और हम जिन लोगो को अपना कहते है दरअसल वो भी अपने नहीं होते, क्योंकि उनका भी कोई अस्तित्व नहीं होता। जो भी मेरे से जुड़े है वो हमेशा मेरा साथ नहीं देंगे, मैं उस मार्ग पे निकल पड़ा हूँ जहाँ लोग अकेले ही चलते है और मुझे भी अकेले ही चलना है, हाँ कुछ रिश्ते है, जिसके लिए समर्पण का भाव मैंने कभी नहीं छोड़ा। मैं सिर्फ प्रेम का भूखा हूँ, यदि आपके मन में मुझे कुछ देने का भाव है तो मुझे बस प्रेम चाहिए और कुछ नहीं, इस्वर ने मुझे एक ऐसे सफ़र में डाला है जिसके लिए शायद मेरा अनुभव बहुत ही कम है, और हर एक पड़ाव में इश्वर ने मेरा साथ दिया और कई रूपों में आकर मुझे हिम्मत दी, पर आज जो भी मेरे साथ हो रहा है, मुझे बस एक खास की जरुरत है, अगर वो ये पढ़े तो शायद समझ जाये, मैं हमेशा अपना कर्म करूंगा और अगर मुझे कुछ गलती हो जाये तो माफ़ी के लिए सर झुकाने में कभी नहीं हीच किचऊंगा , क्योंकि इश्वर दयावान है, वो मुझे अपने शरण पे जरुर लेंगे। http://govindsha.blogspot.com
रविवार, 17 अक्तूबर 2010
रह पाऊँ कैसे ?
अपनी आँखों से आंसू छुपाऊँ कैसे
मैं तो तनहा हूँ तेरे बगैर इतना
यूँ ही रहे तो रह पाऊँ कैसे ?
सोचता हूँ की बंद कर दूँ नैनो को अपनी
पूरी रात आंसुओं से इसको भीगाऊँ कैसे
और, सुबह उठे तो हाथ खुदा के लिए उठे
अब तेरे सजदे में सर झुकाऊँ कैसे ?
अपनी मर्ज़ी के मालिक तुम कब सुनोगी मेरा,
अपनी बातो को कहकर खुद दिल दुखाऊँ कैसे
चली आओ की साँस टूटती है मेरी,
बिन तेरे अब साँस भी ले पाऊँ कैसे ?
सोमवार, 28 जून 2010
जब जब तुम्हारी जरुरत पड़ती है
तुम क्यों नहीं होती मेरे साथ,
पल पल
आती जाती सांसें
जो तुम्हारा नाम लेती है,
यूँ ही तो नहीं ? ? ?
मेरे मन में कपट नहीं होता,
क्या तुमने देखा नहीं था,
मेरा चेहरा,
मेरी मासूम सी आँखों में सुर्ख आंसू,
जब motorcycle में बैठ तुम मुझसे
दूर जा रही थी,
उसी समय तो बिना कहे चुपके से आंसू छलक गए थे,
क्या तुमने देखा नहीं था ?
या फिर एहसास नहीं तुमको ?
तुम ही कहो न,
क्यों जाती तुम मुझे छोड़कर .... जाती तो हो पर मेरे रोने पे भी क्यों नहीं आती,
प्रेम का मतलब केवल रोना ही तो नहीं होता न,
अगर मैं रो के बुला सकता हूँ तो तुम क्यों नहीं आ सकती,
क्या मुझे रोता देखना तुम्हे अच्छा लगता है॥
बहुत अकेला हूँ तुम्हारे बिना,
क्या तुमको समझ नहीं,
आज ऐसा दिन है की, मेरे आँख भी मुझपे रो रहे है,
क्या मेरी गीद गीदाहत , का कोई असर नहीं होता तुमपे,
पर ये बनावती नहीं है, मैं बदल जाऊंगा,
देखना अब मेरी ख़ामोशी, अब लब्ज़ डरते है लबो पे आने से,
क्योंकि उन्हें वो प्यार नहीं मिलता,
फिर वही दिन शायद कभी न लौटे,
वही गर्म सुबह और तीखी मीठी धुप,
ये दिन शायद अब ऐसे न रहे
क्योंकि मेरी मिठास अब कम हो गयी है,
पानी की यही खासियत है, हर रंग में ढल जाता है,
मैं भी ढल गया था, तुम्हारे रंग में,
इसलिए अब अपना अस्तित्व धुंडने में तकलीफ होती है मुझे,
ख्वाब और हकीकत में,
फर्क बस इतना होता है,
ख्वाब अपना होता है, और हकीकत परायी,
अच्छा होता मेरे आंसू, मेरे ख्वाब नहीं होते,
वो ख्वाब जो तुमसे जुड़ा है,
वो हकीकत भी तुम ही से जुडी है,
अगर आ पो तो जल्दी आ जाना,
वरना मेरी नसीब ही है, अकेले में जल जाना।
सोमवार, 24 मई 2010
सोमवार, 5 अप्रैल 2010
कल मिल के दूर हो गए थी तुम
चुप चाप बह रहे थे अश्रु नैन से,
सरे अवसाद घुल के निकल रहे थे
राह अभी भी गिला है इस से,
रात जो हवाएं न चली !
आज भी मन तुझे ही सोचता है
आज भी मैं राह तेरा देखता हूँ
लब्ज़ आज भी बेचैन है कहने को तुझसे
जो कह न पाया मिल के भी तुझसे
कुछ अधुरा सा रह गया, मेरी कल्पनाओ में
स्वपन चुनता और पिरोता हूँ
उस अधूरी कल्पना में रोज़ एक मोती जोड़ता हूँ
आज भी मन तुझे ही सोचता है
आज भी मैं राह तेरा देखता हूँ
वो तुम्हारा छूना मेरे हाथो को
जैसे छु लिया हो अंतर्मन को,
कुछ न कह के भी, कहा था तुमने
और तब से जैसे तेरे रंग में,
अंग - अंग भीग रहा हूँ
आज भी मन तुझे ही सोचता है
आज भी मैं राह तेरा देखता हूँ