कब से दीवाना बना रहा
मैं उसके लिए कब से दीवाना बना रहा
जिसके लिए मेरा प्यार झूठा फ़साना रहा
यूँ तो दुनिया शामिल रहा उसके आशियाँ में
एक मैं ही बेबस अंजाना रहा
बड़ी मुद्दत से उसकी आगोश को तरसे
उम्र भर ग़मो का ही ठिकाना रहा
बहुत सितम सहे मैंने तेरे इश्क में
कुछ यूँ भी मोहब्बत को निभाना रहा
जिस गलियों को छोड़ा था तेरी खातिर
आज वो ही शहर मुझसे बेगाना रहा
मैं उसके लिए कब से दीवाना बना रहा
जिसके लिए मेरा प्यार झूठा फ़साना रहा
लेबल: ghazal

2 टिप्पणियाँ:
bahut khoob
aapki kavitayein lajawaab hai
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बहुत ही सुन्दर |
इसलिए ग़ालिब ने कहा " आग का दरिया है, और डूब के जाना है"
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