शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

कब से दीवाना बना रहा

मैं उसके लिए कब से दीवाना बना रहा
जिसके लिए मेरा प्यार झूठा फ़साना रहा

यूँ तो दुनिया शामिल रहा उसके आशियाँ में
एक मैं ही बेबस अंजाना रहा

बड़ी मुद्दत से उसकी आगोश को तरसे
उम्र भर ग़मो का ही ठिकाना रहा

बहुत सितम सहे मैंने तेरे इश्क में
कुछ यूँ भी मोहब्बत को निभाना रहा

जिस गलियों को छोड़ा था तेरी खातिर
आज वो ही शहर मुझसे बेगाना रहा

मैं उसके लिए कब से दीवाना बना रहा
जिसके लिए मेरा प्यार झूठा फ़साना रहा

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2 टिप्पणियाँ:

यहां 25 जनवरी 2010 को 12:39 am बजे, Blogger Simply Poet ने कहा…

bahut khoob

aapki kavitayein lajawaab hai

check out

www.simplypoet.com

Use the import tool on the site to upload poems from blogger!!

 
यहां 30 मार्च 2010 को 11:27 pm बजे, Blogger abha ने कहा…

बहुत ही सुन्दर |
इसलिए ग़ालिब ने कहा " आग का दरिया है, और डूब के जाना है"

 

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