अपने दर्द, अपने एहसास और अपने ख्वाब को पन्नो पे लिखता हूँ, ज़माना कहने लगा ….. लो !! गोविन्द कवि हो गया !!
मंगलवार, 2 मार्च 2010
एक ख़त अकेलेपन मे लिखा गया
रोज की तरह आज फिर शाम ढलने को है, अभी ऑफिस से निकला हूँ घर जाने के लिए पर ये भी सोच रहा हूँ घर जा के करूंगा क्या ? तुम तो हो नहीं घर पे... कमरे का ताला खोलकर जब कमरे में प्रवेश किया तो चारो तरफ अँधेरा ही अँधेरा था शाम ढल चुकी थी, रात गहरा रही थी ... फिर कुछ देर बैठने के बाद सोचा खाना खा लूँ, फिर वो ही अँधेरा तुम्हे याद करते करते आँखों में आंसू अगर तुम सामने होती तो तुम्हारे गोद में सर रखकर सोता और तुम अपने कोमल हाथो से मेरे बालो को सहलाती ... फिर सोचा करू तो क्या करूँ की मेरी उदासी कम हो जाये... टीवी मै देखता नहीं और फ़ोन करने से तुम्हे देखने का मन कर जाता है... फिर सोचा इंतज़ार कम करने का एक तरीका है की सो jaun पर सुबह उठ के क्या होगा फिर से वोही अकेलापन, आज कल ऑफिस जाना कितना मुस्किल हो गया है जब तुम्हे छत के ऊपर नहीं पता, पर आज भी रोज घर से निकलते साथ एक बार पीछे मुड के देखता हूँ की कहीं तुम नजर आ जाओ... इस अँधेरे मै अब मुझे डर लगने लगा है कहीं मैं बुरा आदमी न बन jaun यादो से पिचा चुदाने के लिए गलत राह का सहारा न ले लूँ। अगर गलत राह मे निकल गया तो मंजिल और दूर हो जाएगी। और वो तुम्हारा फ़ोन पे हँसना काश तुम्हारी मुस्कान थोड़ी कम दिलकश होती तो मैं इतना बेचैन नहीं होता तुम्हे देखने के लिए... मुझे पता है लड़कियां मायके तो जाती ही है और मैंने ही तो अपने राजी ख़ुशी से तुम्हे भेजा था फिर मैं इस परेशानी से क्यों नहीं निकल पा रहा... जिंदगी बहुत मुस्किल हो गयी है..तुम्हारे बिना॥ बस तुम जल्दी आ जाओ... तुम्हारे साथ खाना खाना कितना सुख देता था मुझे अब तो खाने का भी स्वाद नहीं आता, रात भर जागता रहता हूँ॥ तुम्हारी तस्वीर देखता रहता हूँ और वो वक़्त याद करता हूँ जो तुम्हारे साथ बिताया... अब और नहीं रहा जाता तुम जल्दी आ जाओ... हाँ थोडा स्वार्थी हो गया अपनी परेशानी कम करने के लिए तुम्हे जल्दी बुला रहा हूँ पर आज मैं स्वार्थी ही रहना चाहता हूँ...
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1 टिप्पणियाँ:
Waah dost waah...
Good one sachii dil ko isi tarah se bayaan kiya jaata hai...
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