गुरुवार, 7 मई 2009

काश सनम तुम मेरी होती ।

मैं बैठा भीड़ में अकेला हो कर
प्रिये, प्रीत लिए मन में तेरी
चिर, मन, प्रीत कब समझोगी
आंखों की भाषा मेरी,
मेरी रातों में दीपक बन कर जलती
काश सनम तुम मेरी होती


हर झरोके में खुशबू तेरी,
हर लम्हा तेरी याद है,
क्या कहूँ..की मेरे माथे में
बस तन्हाई की रेखा है..
तनहा सागर,, तनहा आकाश, मेरी साथ हमेशा होती
काश सनम तुम मेरी होती

एक बार भी तुमसे कह न पाया
पर दिल से बस तुमको चाहा
जब नींद नहीं थी आंखों में
और रातों में कोई ख्वाब न था,
उन तन्हाई की रातों में,
काश तुम मेरे पास होती,
काश सनम तुम मेरी होती…..

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