सोमवार, 5 अप्रैल 2010

आज भी मैं राह तेरा देखता हूँ

कल मिल के दूर हो गए थी तुम
चुप चाप बह रहे थे अश्रु नैन से,
सरे अवसाद घुल के निकल रहे थे
राह अभी भी गिला है इस से,
रात जो हवाएं न चली !
आज भी मन तुझे ही सोचता है
आज भी मैं राह तेरा देखता हूँ

लब्ज़ आज भी बेचैन है कहने को तुझसे
जो कह न पाया मिल के भी तुझसे
कुछ अधुरा सा रह गया, मेरी कल्पनाओ में
स्वपन चुनता और पिरोता हूँ
उस अधूरी कल्पना में रोज़ एक मोती जोड़ता हूँ
आज भी मन तुझे ही सोचता है
आज भी मैं राह तेरा देखता हूँ

वो तुम्हारा छूना मेरे हाथो को
जैसे छु लिया हो अंतर्मन को,
कुछ न कह के भी, कहा था तुमने
और तब से जैसे तेरे रंग में,
अंग - अंग भीग रहा हूँ
आज भी मन तुझे ही सोचता है
आज भी मैं राह तेरा देखता हूँ