चैतन्य
जब बारिश की बूंदें निकल जाएं बिना भिगोये तुम्हे
जब धुप भी शरीर को जलाने में असमर्थ हो
जब मंजिल को पाने की इच्छा न हो और न खोने का डर
और ना हो कोई भावनाओ का ढेर जो कमजोर बनाती हो तुम्हे,
तब मान लेना तुम हो नहीं, कहीं नहीं, बस चैतन्य है, चैतन्य ही है।
जब पंक्षियों की गूंज कान को छू ना पाए
जब शर्द हवाएं भी बे असर लगे
जब लगे की अब कोई नहीं उस पार, जो राह तेरा देखता है
तब मान लेना तुम हो नहीं, कहीं नहीं, बस चैतन्य है, चैतन्य ही है।
शून्यता का चरम पा लिया है तुमने
कुछ और शेष नहीं, सब पा लिया है तुमने
जब संसार का मोह ना लगे और तुम निकल आओ सब से परे
तब मान लेना तुम हो नहीं, कहीं नहीं, बस चैतन्य है, चैतन्य ही है।
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