शुक्रवार, 24 जनवरी 2025

वो तुम्हारा गुलाबी दुपट्टा

वो  तुम्हारा  गुलाबी  दुपट्टा 

चुप चाप चला आता है, हमारे बीच


उस दिन हम साथ थे, और साथ था वो तुम्हारा गुलाबी दुपट्टा

ठंडी सी हवा देह में लिपटी थी, 

बहुत देर हम चुप चाप खड़े थे

न तुमने कुछ कहा, न मैं ही कह पाया

राज़ अपने दिलो के न तुझको बता पाया


सर्द रातो के ख्वाबो में आती रहती हो तुम

जैसे बारिश के दिनों में मोर आ जाती है सड़को पे

एक ख्वाब ही हो तुम, जो आती है ओढ़े गुलाबी दुपटा


वो  तुम्हारा गुलाबी दुपटा, चुप चाप चला आता है हमारे बीच

मंगलवार, 18 मई 2021

रोना नही , उजियारा अभी बाकी है।

रोना नही , उजियारा अभी बाकी है।

शहर बन्द है, बन्द है दुकाने
पर दिल के किसी कोने मे आशा बाकी है
तू रोना मत मेरे दोस्त, उजियारा अभी बाकी है।
उस पल को याद करना, दोस्तो का झुंड चौराहे पे,
चाय की टपरि पे खिल्खिलाहटो का माहौल,
दोस्तो को मिलने के लिये, भीन्च्ज जता है मन
बुजुर्ग कहते है, देश को किसी की बुरी नजर लग गयी है
पर हमे जीना है अपने लिये, अपनो के लिये,
इस डर के बाद जीत अभी बाकी है,
तू रोना मत मेरे दोस्त, उजियारा अभी बाकी है।

मैं तो एक अश्के - नदामत के सिवा कुछ भी नहीं 
तुम अगर चाहो तो पलकों में छुपा लो मुझको 

-- मोमिन 

चैतन्य

जब बारिश की बूंदें निकल जाएं बिना भिगोये तुम्हे 
जब धुप भी शरीर को जलाने में असमर्थ हो
जब मंजिल को पाने की इच्छा न हो और न खोने का डर
और ना हो कोई भावनाओ का ढेर जो कमजोर बनाती हो तुम्हे,
तब मान लेना तुम हो नहीं, कहीं नहीं, बस चैतन्य है, चैतन्य ही है।  


जब पंक्षियों की गूंज कान को छू ना पाए 
जब शर्द हवाएं भी बे असर लगे
जब लगे की अब कोई नहीं उस पार, जो राह तेरा देखता है
तब मान लेना तुम हो नहीं, कहीं नहीं, बस चैतन्य है, चैतन्य ही है।  


शून्यता का चरम पा लिया है तुमने
कुछ और शेष नहीं, सब पा लिया है तुमने
जब संसार का मोह ना लगे और तुम निकल आओ सब से परे
तब मान लेना तुम हो नहीं, कहीं नहीं, बस चैतन्य है, चैतन्य ही है।  

सोमवार, 18 अक्टूबर 2010

अंतर्भावना

मैं तुम्हे अपने रुमाल पे फूलो की तरह लपेट के रखना चाहता हूँ जैसे किसी मंदिर में पूजा के फूल दिए जाते है आँचल के कोने में बांधने के लिए, जो हमारे जीवन में एक आशीर्वाद की तरह साथ होता है, और ऐसा करके मैं तुम्हे आजीवन आशीर्वाद की तरह पाना चाहता हूँ, मेरा साथ दोगी न ?

--- गोविन्द शर्मा

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परिचय

Orkut में मैंने अपना परिचय कुछ इस तरह लिखा है, यहाँ स्थान की कमी होने ने के कारन एक thread बना दिया

मेरे लिए भावः ही सर्वोच्च सिद्धांत है॥ येही सत्य है जो हर प्राणी के ह्रदय से सीधे निकलता है॥ मैं अपनी भावनाओ को कभी नहीं समेटता .. उन्मुक्त रहने देता हूँ.. आख़िर भावुक लोग ही किसी की संवेदना समझते है… हमेशा उन्मुक्त रहना चाहता हूँ.. मेरा विश्वास है की अगर आप कुछ अपने लिए नहीं करने के बजाय किसी और के लिए करे तो उस से किसी व्यक्ति की ही नहीं अपितु दुनिया को भी हानि से बचाया जा सकता है.. मैं किसी को भी स्वीकार करता हूँ.. चाहे वो मुझे स्वीकारे या नहीं.. मुझे आस्था पे विश्वास है.. मैं अपने जीवन में इश्वर की दया हमेशा मानता हूँ.. इसलिए तो आज भी मन्दिर को देखते ही सर स्वतः ही झुक जाते हैं… मुझे हिन्दी और उर्दू से काफी लगाव है… हिन्दी से युग झलकता है.. मित्रो से हमेशा मिल जुल के रहा,॥ कवितायेँ पढने का शौक है कुछ कवितायेँ लिखता भी हूँ ... अगर मेरी लेखनी किसी एक को भी पसंद आ जाये.. तो मैं इसे एक महान उपलब्धि मानूंगा.. मेरा विश्वास है कि पूरी नेकनीयती से काम करने पर भी यदि किसी से गलती हो जाए तो उसे लोग माफ़ कर दिया करते हैं। मेरे अनुसार जीवन एक संघर्ष है.. एक आकांशा है .. हमारी कोशिश इसे पूर्ण करने की होनी चाहिए । अपनी दुर्बलताओं अथवा अपूर्णताओं के कारण ध्येय को नीचा नहीं करना चाहिए। हमें हमेशा कोशिश करनी चाहिए की हम अपनी दुर्बलताओं को ख़त्म करे.. मुझे इस बात का दुखद एहसास है की मेरी अन्दर दुर्बलताएं भी हैं और अपूर्णताएं भी। मैं इन्हें दूर करने में हमेशा प्रयासरत रहता हूँ और मुझे आशा है मैं ऐसा एक दिन कर पाउँगा.. आखिर येही वो कर्म है जिन्हें हमें करना है. *********************************************************कुछ और अपने बारे में बताऊँ तो : अति भावुक और संवेदनशील , अपने नाम से बिल्कुल अलग। श्री गोविन्द के तरह मैंने कभी प्रेम नहीं पाया, पर उन्ही की तरह प्रेम संजोये रखा है। पेशे से एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में परचेस विभाग में कार्यरत हूँ. ये मेरी चौथी नौकरी है. हमेशा उन्मुक्त रहना चाह॥ यादों की वजह से जब कभी नींद खुल जाती है तो, टूटे हुए सपनो से रात गुजर लेता हूँ। कभी चलते चलते मन करता है… किसी पेड़ के निचे बैठ के आकाश को निहारता रहूँ॥या कभी इन हवाओं में अपनी ही खुशबु ढूँढ लेता हूँ। घुमने का शौक काफी ज्यादा है… किसी अनजान सेहर की राहों में अकेला चलना पसंद है.. तो कभी रातों को बिना वजह जागना. हिन्दी साहित्य में काफी रूचि है.. इसलिए अपना परिचय हिन्दी में ही लिखा. कवितायेँ पढ़ना और लिखना काफी लुभाता है. मैं जब भी दुखी होता हूँ, मेरे हाथो में कलम होती है.. और जब भी खुश हुआ तो हाथो में कलम ही होती है… अपना विषाद और अपना प्यार.. लिख के जताने की आदत है. एक अपनी कविता संग्रह बना चुक्का था.. पर किसी ने पसंद ही नहीं किया.. शायद मेरी खुशी में कोई शरिख नहीं होना चाहता. अपनी अति व्यक्तिगत जिंदगी के बारे में बताऊँ तो॥ कुछ ही महीनो में परिणय बंधन में बंध जाऊँगा… पर शायद उस समय भी मेरा परिचय ये ही रहेगा ----- अति भावुक और संवेदनशील।---------------------------------------------सच कहू तो मेरे पास मेरा कुछ भी नहीं, मेरा शारीर भी तो मेरा नहीं और हम जिन लोगो को अपना कहते है दरअसल वो भी अपने नहीं होते, क्योंकि उनका भी कोई अस्तित्व नहीं होता। जो भी मेरे से जुड़े है वो हमेशा मेरा साथ नहीं देंगे, मैं उस मार्ग पे निकल पड़ा हूँ जहाँ लोग अकेले ही चलते है और मुझे भी अकेले ही चलना है, हाँ कुछ रिश्ते है, जिसके लिए समर्पण का भाव मैंने कभी नहीं छोड़ा। मैं सिर्फ प्रेम का भूखा हूँ, यदि आपके मन में मुझे कुछ देने का भाव है तो मुझे बस प्रेम चाहिए और कुछ नहीं, इस्वर ने मुझे एक ऐसे सफ़र में डाला है जिसके लिए शायद मेरा अनुभव बहुत ही कम है, और हर एक पड़ाव में इश्वर ने मेरा साथ दिया और कई रूपों में आकर मुझे हिम्मत दी, पर आज जो भी मेरे साथ हो रहा है, मुझे बस एक खास की जरुरत है, अगर वो ये पढ़े तो शायद समझ जाये, मैं हमेशा अपना कर्म करूंगा और अगर मुझे कुछ गलती हो जाये तो माफ़ी के लिए सर झुकाने में कभी नहीं हीच किचऊंगा , क्योंकि इश्वर दयावान है, वो मुझे अपने शरण पे जरुर लेंगे। http://govindsha.blogspot.com

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रविवार, 17 अक्टूबर 2010

रह पाऊँ कैसे ?

किसी और को अपना दर्द बताऊँ कैसे
अपनी आँखों से आंसू छुपाऊँ कैसे
मैं तो तनहा हूँ तेरे बगैर इतना
यूँ ही रहे तो रह पाऊँ कैसे ?

सोचता हूँ की बंद कर दूँ नैनो को अपनी
पूरी रात आंसुओं से इसको भीगाऊँ कैसे
और, सुबह उठे तो हाथ खुदा के लिए उठे
अब तेरे सजदे में सर झुकाऊँ कैसे ?

अपनी मर्ज़ी के मालिक तुम कब सुनोगी मेरा,
अपनी बातो को कहकर खुद दिल दुखाऊँ कैसे
चली आओ की साँस टूटती है मेरी,
बिन तेरे अब साँस भी ले पाऊँ कैसे ?

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