शुक्रवार, 8 मई 2009


कल रात तुम्हे सपने में देखा

आँख लगी और मैं, खो गया
झील पार कोई आगाज़ था,
थोड़ा अनजान.. थोड़ा पहचान था
धुंद थी कुछ देख न पाया
पर.. हवाओ ने पहचान कराया
हमसफ़र नाम था, सपने में नियति का चेहरा देखा
कल रात तुम्हे सपने में देखा


पास गया, तुम वही खड़ी थी
कुछ सोच और कुछ देख रही थी
रेत में लिखा था नाम, शायद मेरा था
तुम्हारी निगाहें मुझको देखे ,
मेरे नैन भी देखे तुमको,
बात छुपी थी, बताना था मुझे,
साँस तुम्हारी है, जताना था मुझे
हाथ बढाया… स्पर्श करने को..
आँख खुली.. सपने की नदी को थमते देखा,
कल रात तुम्हे सपने में देखा

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