साये
तेरे ख्यालो के साये, तेरे सवालो के साये
नज़रें बेजार, बेरुख नजारो के साये
अभी जिंदा हूँ की मेल बाकी है अपना
वरना जिंदगी के चारो और गुनाहों के साये
नहीं लगता अब मन, बिन सुने आवाज़ तेरे
वो मीठी आवाज़ में पूछना तुम्हारे सवालो के साये
मैं तो उलझा हूँ जिंदगी के चौराहे पे,
मोड़ दिखाते तेरे दख्त और राहों के साये
टूट जाए एक हरक़त से ये दिल “गोविन्द”
बचा के रखा है इन्हे , तेरी यादो के साये..
