गुरुवार, 16 जुलाई 2009

साये

तेरे ख्यालो के साये, तेरे सवालो के साये
नज़रें बेजार, बेरुख नजारो के साये

अभी जिंदा हूँ की मेल बाकी है अपना
वरना जिंदगी के चारो और गुनाहों के साये

नहीं लगता अब मन, बिन सुने आवाज़ तेरे
वो मीठी आवाज़ में पूछना तुम्हारे सवालो के साये

मैं तो उलझा हूँ जिंदगी के चौराहे पे,
मोड़ दिखाते तेरे दख्त और राहों के साये

टूट जाए एक हरक़त से ये दिल “गोविन्द”
बचा के रखा है इन्हे , तेरी यादो के साये..

1 टिप्पणियाँ:

यहां 24 अगस्त 2009 को 12:19 am बजे, Blogger शशि "सागर" ने कहा…

sundar koshish hui hai janab..
achha laga aapko padhna...
yun hee lekhnee ko nikharte rahen

 

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