सोमवार, 15 जून 2009

मयकदो में आ के देखना

कभी ग़म को सिने से भुला कर देखना
मयकदो में आओ तो मुझे बुला कर देखना

सालो हुआ किसी को ग़म सुनाये हुए
इस शहर – ऐ- ग़म में कभी आ के देखना

उनकी एक बेवफाई ने मयकदो की राह दिखा दी,
पर अब भी कहते है राहे वफ़ा आजमा के देखना

थे हम ही नादान महफिल-ऐ-वफ़ा में
बाज़ार लुटा मेरा, ज़रा वीरान – ऐ – बाज़ार देखना

दूर हो जायेंगे तेरे नज़रो से एक मर्तबा बोल तो ज़रा
जियेगा फिर भी “गोविन्द” बेवफाई में आ कर देखना

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1 टिप्पणियाँ:

यहां 19 अगस्त 2009 को 10:29 pm बजे, Blogger Munna Paswan ने कहा…

kabile tarif rachna .......govind jee thankyou

 

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