सोमवार, 18 मई 2009

जीवन बस समर्पण तुझको

पहले शौकिया तौर पे लिखता था.. पर अब लिखना जरुरत है.. वो तो अभी पास नहीं.. पर उसकी तस्वीर है… अभी मोहब्बत तो नहीं पर मोहब्बत की लकीर है.. बस येही ख्याल दिल को सताया.. हाथो में कलम आया…. और कुछ लिखा..जिसे प्रस्तुत कर रहा हूँ।

जीवन बस समर्पण तुझको
भूल चूका हूँ दर्द पुराना
जीवन प्रफुल्लित, चाह तुम्हारा
अपने पर में अब नाज मुझे है
कहाँ तक ये बात सही है
अपने हाल पे बिस्वास नहीं मुझको
जीवन बस समर्पण तुझको

जब जब तुम सपनो में आये
मैंने अपने गीत बनाये
मेरे गीत तुमको ही समर्पण
स्पर्श तुम्हारा बस प् जाऊं
क्या मेरे गीत पे नाज नहीं तुझको
जीवन बस समर्पण तुझको

सोचा करता बैठ अकेले
तेरी छवि बस छलकती है
तुझको देखने की इच्छा में
अश्क मेरे नैन धोती है
में भी एक मानव ही हूँ
अब और नहीं सतायो मुझको
जीवन बस समर्पण तुझको

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