सोमवार, 21 सितंबर 2009

जिधर देखूं तेरी तस्वीर नज़र आती है,
तेरी सूरत मेरी तकदीर नज़र आती है,
जीता हूँ मैं तेरे लिए, जीवन तेरा है॥
मेरी खुशियों की तू जागीर नज़र आती है,
और कुछ अब याद रहता नहीं,, एक तुम्हारे सिवा...
हाथो में तेरी ही लकीर नज़र आती है... !!

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तेरी यादो के दिए दिल में जलाये रखे हैं,
तेरी आने की आस में राहों पे फूल बिछाये रखें हैं,

हर एक आहट पे दरवाजे पे जाना मुमकिन नहीं,
इसलिए हर दरवाजे पे एक नजर जमाये रखे है,

कदम उठते ही तेरे आशियाँ की तरफ़ बढ़ता है ये "गोविन्द"
जमाना मुझे दीवाना न कहे, इसलिए ख़ुद को सबसे छिपाए रखे है॥

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उसका आलम... आलम भी अजीब होता है
जब मेरा दिल तुम्हारे करीब होता है,

प्यारे बनते है और भी प्यारे अपने,
ये भी रिश्ता अजीब होता है,

अपना घर भी जब आराम नहीं देता,
जब जमाना भी रकीब होता है,

तेरी सूरत आंखों में तब तक बसी रहती है,
जब तक आँखों में रौशनी शरीक होता है,

जमाना कहता है तू निकम्मा है "गोविन्द"
पर दिल जानता है, तुझसे ही रात और दिन होता है।

प्यार है तुझसे प्यार ही रहने दो,
मेरे सुख हो तेरे, दुःख भी सहने दो,
नम आंखों से दिल को रोने दो,
एक हो जाए सदा के लिए.... कभी याद आओ तो कभी पास आओ...
मुझे दिल से कभी न सताओ... मेरे पास आओ फिर कभी न जाओ... !!

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