मंगलवार, 28 अप्रैल 2009


कही पढ़ा था की कवि हमेशा अकेले हो जाते है ... विषय पे सोचा तो पता चला सभी अकेले ही है ---

अकेले पन की सजा अक्सर हमने पाई है

अकेले पन ने ही हमको ग़लिब की ग़ज़ल सुनाई है

लोग अकेले है इस दुनिया में…

जब तक एक मानव से दुसरे मानव की लडाई है

हाँ कवि के साथ अकेलेपन का रिश्ता बहुत पुराना है॥ कवि अकेले ही कुछ लिख पता है॥ किसी के लिए हमारा लिखना पागलपन है॥ तो कोई इसे अपने टाइम पास के लिए पढ़ लेता, हमारी संवेदना अगर किसी तक पहुँचती हो तो, हम अपनी रचना को अमर मान ले, बस हम अपनी सोच को शब्दों में डालते है,,, सारे लोगो को पसंद नहीं आता॥ पर जिसके साथ गुजरी हो वो तो जरुर भावुक हो जाएगा..... कवि हमेशा अकेला होता है... और एकांत उसका हमसफ़र.... मैं भी अकेला हूँ, पर तब जब मैं कुछ लिखता हूँ... वरना परिवार मेरा भी है॥

भ्रष्टाचार के भीड़ में , कभी दर्द तो कभी प्रेम

और हँसी से सु सज्जित शब्द बरसाने वाले

हम कवि अकेले हो जाते है॥

इसलिए के इस माडर्न युग में चलते हुए लोगो

को हम कभी रास नहीं आते ...

समाज से हम हमेशा जूझते ॥

पर किसी की यकीं जीत न पते

इसलिए कवि हमेशा अकेले हो जाते

आपका - गोविन्द शर्मा

लेबल:

बुधवार, 22 अप्रैल 2009

स्वीकार

बस मुझको स्वीकार कर लो,
मैं अपने दुःख से चिल्लाता,
दिल को अपने में बहलाता,
अपने मुस्कानों से हलकी, मेरे दुःख का भार कर लो,
बस मुझको स्वीकार कर लो….

मैं जग के धाक से डरता नहीं
समय के अभिशाप से डरता नहीं
तुम ले लो मेरा नाम, अजर कर लो
बस मुझको स्वीकार कर लो….

खुशियाँ तेरी राहों पे निछावर कर दूँ,
संताप तुम्हारी राहों के, अपना कर लूँ
प्यार निछावर और समर्पण से डरता नहीं,
तुम गा लो मेरा गान अमर कर लो,
बस मुझको स्वीकार कर लो !!!!

तकल्लुफ


तकल्लुफ न कर, इंकार कर दे
प्यार अगर हो तो, इज़हार कर दे
तुम्हारी हाँ पर लड़ सकता हूँ लोगो से,
बस साथी, साथ साथ निभाने का करार करदे
मैं भी बहता चला जाऊं, तुम्हारी धार पे
कुछ देर कहीं, निर्मल छहों में तृप्त करदे
तकल्लुफ न कर, इंकार करदे
प्यार अगर हो तो, इज़हार कर दे

क्या तुमसे पूछूँ और क्या बतलाऊँ
क्या दिल में रही, जब तुमको चाहा
मैं कितना भी भूलूँ, रात याद तुम्हारी आएगी
मुझको अपनी हाथो का लकीर कर दे,
तकल्लुफ न कर, इंकार करदे
प्यार अगर हो तो, इज़हार कर दे

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2009

वो हमसे रूठ गये


अब दमन फूलो से चुराता हूँ, वो हमसे रूठ गए
खो गयी बहार, खामोशी – ऐ – गुल के
दुनिया – ऐ – खुश बे मजाक, मस्ती तिश्नगी के
गमो से हर चाँद रहा अपना नाता
अब दमन फूलो से भी चुराता, वो हमसे रूठ गए

जख्म गहरे हुए जाते हैं, और भी दिल के
वक्त खवाबो में गंवाया है तिल – तिल के,
देखि नहीं मोह्हब्बत बेवफा – ऐ – दिल से
सोचा था अब प्यास बुझे, प्याले जहर से
बेवफा हुई जहर, जब हम पी गए
दुनिया हुई शमशान, वो हमसे रूठ गये

गुरुवार, 9 अप्रैल 2009

आंशुओं

उनसे कह दो की वो चले जाएँ
कहीं मेरे आंशुओं के बरिश में वो न भिग जाये

जबान खामोश थी उनसे नज़रें मिलने पर

बात जुबां तक आते ही, उन्होंने इनकार कर दिया


रात उनकी सपनो में याद आइ
जैसे सूखे हुए पत्तो में बहार आई
ऐसे सराहा उन्होंने सर को मेरे
जैसे एक बीमार को करार आई

बेवफा

उसने बदल दिया दिल - ऐ - गुलज़ार का मौसम

"स्वेता" क्या जाने, दिल कितना पाक था...

चेहरे की रौनक, नुमाइश नहीं थी करनी॥

दिल कुरेत लिया होता,,वफ़ा का ही राग था !!

लेबल:

अरमान पिघलते रहे, जनाजे जलते रहे,
अफसाना ख़त्म हुआ, उनके इनकार के
बादमौसम नहीं बदलता, सितारों पे घूम
आयेरात आवारा होने लगी, उनके इनकार के बाद,
मार ही डाले, जो बे मौत,नज़रो में वो दम था,
अब नज़रें बेजार हुई,उनके इनकार के बाद,
हम भी किसी फुट - पाथ पर चुप चाप मर सकते है,
खाक - ई - जिंदगी, खून - ये - दिल हुई.......
उनके इनकार के बाद !!

लेबल: